बुधवार, 21 जनवरी 2015

आँसू

दिनेश जी की कविता 'आँसू' .... इस शब्द की सबसे सटीक परिभाषा है।

     
   'आँसू'

जीवन संग जनमते आँसू,
आँसू से पहला परिचय है।

विवश नयन से बहने वाला
हर आँसू अपने आँसू है ।
चिर-परिचित मनमीत अपरिचित
मरे सकल संकल्प समर्पित
सम्बन्धों में नमक घुल गया
तो नमकीन बना आँसू है॥

निखर-निखर निर्झरनी आँखें
भीग-भीग उठती हैं पंखें
प्राण पाहुने पल-पल रोये
दृग में दर्द सना आँसू है ॥

आस-पास जब चाँद महकते
अन्तर्मन के घाव दहकते
बिखर गए मधुवंती सपने
हर बिखरा सपना आँसू है ॥

प्राणों में घुल गए धुंधलकते
फिर पलकों पर आँसू छलके
जीवन के दुखड़े धोने को
स्रष्टा की सृजना आँसू है ॥

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

एक भी विश्वास मेरा


बरेली की लिखावटें कितनी पुरानी होंगी .... इस सवाल का जवाब भी उस वक़्त मिलता चला जाएगा जब हम बोलते पन्नों की दस्ताने सुनते हुए आगे निकाल चुके होंगे । चलिये इस सफर  के साथ शुरुआत करते हैं उस  दौर को जीने की  ...
  विश्वास है कि कवि दिनेश गोस्वामी की रचनाओ के साथ शुरू हो रहा ये सिलसिला हमें अतीत कि खिड़की के और बाहर झाँकने का मौका दे ...



          'एक भी विश्वास मेरा'

एक भी क्षण जी न पाया
 एक भी विश्वास मेरा
एक बंधन तोड़ते ही
बन गया फिर एक घेरा ।

खोजते फिरते रहे
सुख-सुरभि जग की पराधियों में
प्रश्न चिन्हों सी लगाए
टकटकी प्रतिमान मन के
मिल न पायी छाव कोई
पंथ में हारे चरण को
बहुत पछताए नयन में
इंद्रधनुषी स्वप्न बुन के
हो गया पल में अपरिचित
सांझ का अपने बसेरा ।

झुरमुटों की ओट ले कर
चंद ने चूमा निशा को
प्राण ने प्रिय को पुकारा
लाख हमने चाह रोकी
शीश धुनते रह गए
एकांत से सहमे निमंत्रण
आह भर के लौट आई
धुन थके भीगे स्वर की

रंग कोरे चित्रपट पर
भर गया ऐसे चितेरा ।

कामना सिसके अबोली
शून्य के आलिंगनों में
बैठे रोये खँड़रों में
सांझ को जैसी उदासी
अश्रू में हमने पिरोया
चंदिनी सा हास निर्मल
भावना पल-पल जली॥
               -
       दिनेश गोस्वामी