सोमवार, 15 जून 2015

कुछ मुक्त अकेले अंश ....




 दिनेश गोस्वामी की यूं तो 'प्रिये तुम्हारे लिए ' काव्य संग्रह की रचनाओं में , पूरी कविताए बहुत खूबसूरत है ।  लेकिन इनकी कविताओ के कुछ बेहद खास अंश यहाँ सांझा किए जा रहे है .....


* पहली पंक्तियाँ इनकी कविता 'किसके कंधे ...' से प्रस्तुत है


सुमनों से सपने सिसक रहे
घुल गरल गया सम्बन्धों में,
मैं मुक्ता अकेला रही हूँ
मत बांध मुझे अनुबंधों में ।


* 'कहीं नीरव निशा रोई ' कविता के ये अंश ...


कहीं नीरव निशा रोई
कहीं शुभ प्रांत मुसकाया
डगर में धूप सुलगी है
मगर हम डूंढते छाया
हमे कसती न मिल पायी
तुम्हें साहिल न मिल पाया
सुरों ने दर्द बिछुरान का
सुरीले गीत में गया ।

 क्षितिज के छोर तक फैली
उदासी ही उदासी है
जली जो ज्योति जीवन की
दिये की वर्तिका सी है
सकाल भूतल भुवन नश्वर
यहाँ जन जन प्रवासी है

तुम्हारे नैन में सावन
हमारी आँख प्यासी है ,
अनूठी अनबुझी तृष्णा
न कोई तृप्त कर पाया ।

* 'दृग में अनंत आकाश ' की पंक्तियाँ ...

जगजीवन चिन्हा अनचिन्हा
कल जाने कहाँ बसेरा हो
किस ठौर सुरमई सांझ ढले
मुस्काता नया सवेरा हो ।
हर समय, समय समझता है
सम्पूर्ण सृष्ठी नश्वर प्रांगण !


* इसके बाद लेते हैं इनकी लिखी गजल के कुछ अंश ...
::  नादान है तरुणाई , समझाऊँ इसे कैसे 
 महफिल में नहीं करते, हर बात अकेले में ॥

:: आवाज़ तुम्हें देते जो तुमने किए वादे
तुम भूल गए शायद , रस्ते मेरी राहों के ॥

:: बाजुवा पर कटे परिंदों को
दुनियाँ ये कत्लगाह लगती है ।

किसको ये इल्ज़ामें बावफ़ाई दूँ
बेबसी बेगुनाह लगती है ॥

बुधवार, 21 जनवरी 2015

आँसू

दिनेश जी की कविता 'आँसू' .... इस शब्द की सबसे सटीक परिभाषा है।

     
   'आँसू'

जीवन संग जनमते आँसू,
आँसू से पहला परिचय है।

विवश नयन से बहने वाला
हर आँसू अपने आँसू है ।
चिर-परिचित मनमीत अपरिचित
मरे सकल संकल्प समर्पित
सम्बन्धों में नमक घुल गया
तो नमकीन बना आँसू है॥

निखर-निखर निर्झरनी आँखें
भीग-भीग उठती हैं पंखें
प्राण पाहुने पल-पल रोये
दृग में दर्द सना आँसू है ॥

आस-पास जब चाँद महकते
अन्तर्मन के घाव दहकते
बिखर गए मधुवंती सपने
हर बिखरा सपना आँसू है ॥

प्राणों में घुल गए धुंधलकते
फिर पलकों पर आँसू छलके
जीवन के दुखड़े धोने को
स्रष्टा की सृजना आँसू है ॥

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

एक भी विश्वास मेरा


बरेली की लिखावटें कितनी पुरानी होंगी .... इस सवाल का जवाब भी उस वक़्त मिलता चला जाएगा जब हम बोलते पन्नों की दस्ताने सुनते हुए आगे निकाल चुके होंगे । चलिये इस सफर  के साथ शुरुआत करते हैं उस  दौर को जीने की  ...
  विश्वास है कि कवि दिनेश गोस्वामी की रचनाओ के साथ शुरू हो रहा ये सिलसिला हमें अतीत कि खिड़की के और बाहर झाँकने का मौका दे ...



          'एक भी विश्वास मेरा'

एक भी क्षण जी न पाया
 एक भी विश्वास मेरा
एक बंधन तोड़ते ही
बन गया फिर एक घेरा ।

खोजते फिरते रहे
सुख-सुरभि जग की पराधियों में
प्रश्न चिन्हों सी लगाए
टकटकी प्रतिमान मन के
मिल न पायी छाव कोई
पंथ में हारे चरण को
बहुत पछताए नयन में
इंद्रधनुषी स्वप्न बुन के
हो गया पल में अपरिचित
सांझ का अपने बसेरा ।

झुरमुटों की ओट ले कर
चंद ने चूमा निशा को
प्राण ने प्रिय को पुकारा
लाख हमने चाह रोकी
शीश धुनते रह गए
एकांत से सहमे निमंत्रण
आह भर के लौट आई
धुन थके भीगे स्वर की

रंग कोरे चित्रपट पर
भर गया ऐसे चितेरा ।

कामना सिसके अबोली
शून्य के आलिंगनों में
बैठे रोये खँड़रों में
सांझ को जैसी उदासी
अश्रू में हमने पिरोया
चंदिनी सा हास निर्मल
भावना पल-पल जली॥
               -
       दिनेश गोस्वामी